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An evening of Ghazals, Nazm & Geet.

दरिया दिया और प्यासे रहे

दरिया दिया और प्यासे रहे, उम्र भर साथ अपने दिलासे रहे। जो थे वैसा रहने न दिया, न सोना बने, न कांसे रहे। कब टिकती है अपने कहे पर, ज़ुबां ए जीस्त पर झांसे रहे। मुद्दतों कायम रहा अपना डेरा, हम जहाँ भी रहे, अच्छे खासे रहे। मुझमें क्या कुछ न बदला ‘वीर’, मगर ग़ैरों

मैं न कोई मसीहा न कोई रहनुमा हूँ

मैं न कोई मसीहा, न कोई रहनुमा हूँ, मैं अपनी आग हूँ, मैं अपना ही धुंआ हूँ। मुझे परखने वाले शायद ये नहीं जानते, मैं अपना गुनाह हूँ, मैं अपनी ही सज़ा हूँ। हर बार नाकाम हुई है साजिश दुनिया की, मैं अपना मुकद्दर हूँ, मैं अपना ही खुदा हूँ। मुझे लौट कर फिर वहीं

कभी घर नहीं आता..

यहीं कहीं तो था.. अब नज़र नहीं आता, सिर्फ ठिकाने मिलते हैं, कभी घर नहीं आता । कैसे बताऊँ किस मुश्किल से आ पहुंचा हूँ! मुसाफिर के साथ चलकर सफ़र नहीं आता । दिल में ज़रूर सुराख़ हो गया है वगरना, क्यों पहले की तरह अब भर नहीं आता | दर्द की दीवारें, फर्श, दरवाज़े

अच्छा लगता है…

तुम से दिल की हर बात कहना अच्छा लगता है, इस बेगानी दुनिया में तू मुझे अपना लगता है| तुझ संग गुज़र रही है बहुत आराम से ज़िंदगी, तुझ बिन फूलों से भरा रास्ता खुदरा लगता है| तुम से दिल की हर बात कहना अच्छा लगता है… सादा दिल ही यहाँ होते हैं दाग-दाग, जिन्हें

तराशा हुआ पत्थर हूँ

तराशा हुआ पत्थर हूँ, अब बस टूटना बाकी है, पुर्जे तो मेरे कर चुके हो, अब बस लूटना बाकी है| हर शक्स ईमारत ए सब्र के आखिरी छोर पर है, उम्मीद हार चुका है, अब बस कूदना बाकी है| तराशा हुआ पत्थर हूँ, अब बस टूटना बाकी है… राह में नज़र चुरा कर चले जाते

इंतज़ाम

मयखानों में शराबों का इंतज़ाम किजीये, हम पढ़ने आये हैं, आँखों का इंतज़ाम किजीये| मुझे ढूंढ रहा है मेरा माज़ी गलियों गलियों, ए मेरी हसरत ओ तमन्ना.. ठिकानों का इंतज़ाम किजीये| हम पढ़ने आये हैं, आँखों का इंतज़ाम किजीये… ये नींद एक रात की नहीं.. सदीयों की है, कब्र में जा रहा हूँ… ख़्वाबों का

बहते बहते

कह दे के देर ना हो जाए कहते-कहते, ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते| फिर ज़ख्म खाने की आदत हो जाएगी, गर यूँ ही खामोश रहा तू सहते-सहते| ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते… हुनर नहीं बस नवाज़ा है खुदा ने, लिखता हूँ ख्याल अपने यूँ ही बैठे-बैठे| ये किनारा भी न छूट

खाली हाथों में

खाली हाथों में सिर्फ लकीरें न देख, मेरा होसला भी देख, सिर्फ तकदीरें न देख| कुछ कर गुज़रने के तलब खत्म नहीं हुई, मेरे अंदर की आग देख, पैरों की जंजीरें न देख| खाली हाथों में सिर्फ लकीरें न देख… चला आता है मुझ तक मुश्किलों का काफिला, मेरे उसूलों की ज़मीन देख, ज़माने की

चांदनी का डर्र

अँधेरी तन्हा रात कितनी उदास बेठी है, चांदनी डर्र से चाँद के पास बेठी है| है मेरे रकीब चारो तरफ महखाने में, वो जो एक महज़बीं मेरे पास बेठी है| चांदनी डर्र से चाँद के पास बेठी है… तेरा वजूद ही मेरी क़ज़ा का फरमान है, जाम के साए में छुपकर प्यास बेठी है| चांदनी