Category: ग़ज़ल

अब भीगेंगे सावन में

अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक, गीली मिट्टी के महक से.. तेरे दामन की छाओं तक| काली सड़कों पर पानी भी काला है, कोई ले चले हमें.. इस शहर से उस गाँव तक| अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक… ये दौड़ किसी पागलपन से कम तो नहीं, आदमी भागता है एक

ये कैसा लहजा है

तेरी दिल्लगी से आ पड़ती है मेरी जान पर, ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर| अब हुआ है तो इज़हार ए वफ़ा भी कर ले, रुकता नहीं है देर तक तीर कमान पर| ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर… कोई दौड़ नहीं ये राह-ए-जीस्त है ‘वीर’, खुद को थामना

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में, खुदको पीछे छोड़ आये.. अपनों की तरक्की में| मुद्दत का थका हुआ था, तो आख लग गयी, सारा मंज़र ही बदल गया.. एक झपकी में| कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में… रिश्ता धुंधला गया, वक़्त के कोहरे में, खबर ए रुखसत निगल गए.. एक सिसकी में| कुछ

जिसकी इजाज़त दिल न दे

जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये, इन हाथों से अपना खेल तमाम मत कीजिये| बेसबब नहीं होता.. कुछ भी यहाँ, खुद से गद्दारी का ये काम मत कीजिये| जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये| डर्र हो या मोहब्बत हो किसी से, अपनी शक्सियत को दुसरे का गुलाम मत कीजिये|

दिल बहुत ज़लील हुआ

लम्हा मोहब्बत से अना में तब्दील हुआ, उसे दुनिया से मांग कर.. दिल बहुत ज़लील हुआ| तेरी बेरुखी मंज़ूर हो चली थी हमें, तेरा सच कहना रिश्ते की आखरी कील हुआ| उसे दुनिया से मांग कर दिल बहुत ज़लील हुआ… मेरे जज़्बात सबब से अनजान ही रहे, मेरा बयां ए वफ़ा गुनाहगार की दलील हुआ|

इलज़ाम तूफानों पर आता रहा

मैं दिल का गुबार उड़ाता रहा, इलज़ाम तूफानों पर आता रहा| मैं छोड़ आया वो शहर ए वफ़ा, वो गली.. वो मोहल्ला बुलाता रहा| इलज़ाम तूफानों पर आता रहा… मुद्दत हो गयी उसको टूटे हुए, वो ख्वाब मगर.. जगाता रहा| इलज़ाम तूफानों पर आता रहा… उसका छुपाने का हुनर देखिये, वक़्त ए रुखसत भी मुस्कुराता

जिंदिगी रूठी हुई

है लम्हें का अरमान मुझसे लिपट जाने का, देख रही है उसे हसरत से.. जिंदिगी रूठी हुई| मैं अपने ख़वाब जग ज़ाहिर नहीं करता, ये सलतनत है मेरी सभी से लूटी हुई| देख रही है उसे हसरत से जिंदिगी रूठी हुई.. उसने संभाल कर अलमारी में दफना दिया, वो जो एक चूड़ी थी उस दिन

रोज़ देखता हूँ!

सियासत का वहशी नंगा नाच.. रोज़ देखता हूँ, हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ| कभी इसके सर तो कभी उसके सर टांग दिया, हर नए दिन एक नया सरताज.. रोज़ देखता हूँ| हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ| तुम मोदी चिल्लाते हो, या फिर राहुल जपते हो, मैं तुम्हारे

मगर कोई कमी है

मैं तुझे अपनी आँखों में भर तो लूँ ज़रा, न जाने क्यों वक़्त को, गुज़रने की हड़बड़ी है| गुज़र जायेगा मगर.. फिर से आएगा ज़रूर, ये जीवन दुःख और सुख की कड़ी दर कड़ी है| न जाने क्यों वक़्त को, गुज़रने की हड़बड़ी है… हैरत है के अब भी जिंदा हूँ किस तरह, देख जिंदिगी

हर शक्स के हाथ में कटोरा है!

हर शक्स के हाथ में कटोरा है, जिसके पास जितना है.. थोड़ा है| सांस – सांस मुजरिम बनी है, मेरी हर सांस ने मुझे तोड़ा है| हर शक्स के हाथ में कटोरा है… हसरत ए ख़ुशी में भागता है वहशी, आदमी.. आदमी कहाँ है? घोड़ा है! हर शक्स के हाथ में कटोरा है… मुझसे मांग