Category: ग़ज़ल

चंद लम्हों को

चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं, बनाने वाले गमों को भी, खुशियाँ बना लेते हैं| न पंख बचे और अब न होसला उड़ने का, शाम होते ही, हम कागज़ पर तितलियाँ बना लेते हैं| चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं… घुटने टेक दिए हैं हर हसरत ने आते-जाते, अपने अंदर के

मुश्किल वक्त

जर्जर हौसला मरम्मत मांगता है, मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता है| उम्र भर नेकी न की गयी मगर, अब बुढ़ापे में जन्नत मांगता है| मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता… वफ़ा के सौदे में वो सितमगर मुझसे, शर्त में बेशर्त मोहब्बत मांगता है| मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता… काफ़िर बेटों का वो खुदा-परस्त बाप, औलादों के लिए मन्नत मांगता

तुम और मैं

राह-ए-उल्फत में अपना ठिकाना न आया, मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया| साज़-ए-जिंदिगी ने सुर ऐसा छेडा, मुझे गाना न आया, तुम्हें गुनगुनाना न आया| मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया… बच्चों की तरह गिले भी बड़े हो गए, मुझे भुलाना न आया, तुम्हें मिटाना न आया| मुझे रूठना न आया, तुम्हें

खींच लाया हूँ

समंदर से समंदर तक खींच लाया हूँ, तन्हा साहिल को अंदर तक खींच लाया हूँ| मैंने खुद जलाया है अपनी कई हसरतों को, एक सिकंदर को कलंदर तक खींच लाया हूँ| तन्हा साहिल को अंदर तक खींच लाया हूँ… तिनका – तिनका रोज़ उछालता हूँ गुबार उसका, ज़मीं के सितारों को अंबर तक खींच लाया हूँ|

अंगार ढूँढता हूँ

कैसा कर्ज़दार हूँ के सूद लिए साहूकार ढूँढता हूँ, जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूँढता हूँ| न शहर बचा, न घर.. और न घर में रहने वाले, तन्हाई की धुप में सर छुपाने को दीवार ढूँढता हूँ| जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ… एक मुद्दत गुज़र गयी

नहीं देखी जाती

तुम्हारी आँखों में हमसे वहशत नहीं देखी जाती, अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती| वो मेरी वफ़ा का रोज़ इम्तिहान क्यों लेता है? क्या उससे मेरी बेशर्त मोहब्बत नहीं देखी जाती? अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती… पलक-पलक हर आँख में क्यों चुभता है भला, इस ज़माने से हमारी कुर्बत

ताकत बहुत चाहिए

खामोश रहने के लिए, ताकत बहुत चाहिए, ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए| यूँ तो मुझे भी हासिल है अदा रूठने की, रूठे रहने के लिए, अदावत बहुत चाहिए| ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए… उम्र भर हम तुझे दुआओं में मांगते रहे, मगर असर के लिए, इबादत बहुत चाहिए| ज़ुल्म सहने के

जिंदिगी को चख कर देखा

जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी, गुज़रे सब सालों की फसल बरबाद लगी| एक-एक करके सारा वक्त लूट लिया सबने, रिश्तों की ज़िम्मेदारियाँ लालची दामाद लगी| जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी… शहर की रोशन सड़कों में तन्हाई का बसेरा है, हमें मोहल्लों की स्याह गलियां आबाद लगी| जिंदिगी को चख

छोड़ दिया है

अब हमने धक्का देना छोड़ दिया है! रिश्तों को कांधों पर ढोना छोड़ दिया है | या हम दाना हुए या तुम में वो बात नहीं, या इश्क ने ही जादू टोना छोड़ दिया है | रिश्तों को कांधों पर ढोना छोड़ दिया है… कोई पूछे तो अब भी तेरा ही नाम लेते हैं, मुद्दत

मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं

मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं, मेरी तरह वो तुम्हें पसंद आये तो नहीं | क्या लफ़्ज़ों को है गिला-शिकवा बहुत ? क्या कहीं वो भी मेरे सताये तो नहीं | मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं… सहरा तक पहुँचती हर एक मौज से पूछो, क्या उसने कोई सफीने डुबाये तो नहीं | मेरे लफ्ज़