Category: ग़ज़ल

बीते बरस

बीते बरस को याद करें, तरसे कितना उसके लिए, याद करें| उम्र और चली एक कदम, वही ख्वाब रहा हमारा हरदम| कैसे बदले वक़्त और हालात, बात करें| बीते बरस को याद करें … अबके साल इन्हें फिर संजोना होगा, भूले, टूटे, बिछड़े ख्वाब याद करें| बीते बरस को याद करें …. हाकिम बने खुद

बंद दरवाज़े

रस्मों की दीवारों पे जड़े बंद दरवाज़े, खयालों की भीड़ में, खड़े बंद दरवाज़े| ये जहाँ तुम्हारा, ये ईमान तुम्हारा, मेरे अरमानो को क्या क़ैद कर सकेंगे, तुम्हारी सोच के ये बंद दरवाज़े| ‘वीर’, एक दिन तेरी कहानी के गवाह बनेंगे, खयालों की भीड़ में खड़े ये बंद दरवाज़े|

आवाज़ है तेरी

तरसती आँखों को आस है तेरी, भटकती राहों को तलाश है तेरी| सबब-ए-फिराक का इल्म नहीं, कौन सी मजबूरी हमराज़ है तेरी| भटकती राहों को तलाश है तेरी… ना समझ मुकद्दर को खुदा, हर अंजाम की आगाज़ है तेरी| भटकती राहों को तलाश है तेरी… ख्वाबों की कीमत सांसों से देने वाले, जिंदिगी बेंचती है

मैं

तन्हा हूँ, अकेला नहीं हूँ मैं| किसी का बहुत प्यारा हूँ, सौतेला नहीं हूँ मैं| किसी की आँखों का नूर हूँ, किसी की जिंदिगी का सुरूर हूँ| खुद बेबस हूँ तो क्या, किसी की मजबूरी नहीं हूँ मैं| वक़्त के सितम, जज्बातों ने सहे, भीगती पलकों ने, कितने अफ़साने कहे| गम के समंदर में हूँ,

मन करता है

दिल कुछ भारी सा है, आज रोने का मन करता है| कुछ उदासी है ज़हन में, देर तलक सोने का मन करता है| ये बंदिशे तोड़ के ज़माने की, आज उड़ने का मन करता है| दिन बीत रहा है हर रोज़ की तरह, आज कहीं खोने का मन करता है| दूरियाँ और भी बढा दी

क्या था… क्या ना था

चली थी मुझ तक, यूँ तो कुछ तेज हवाएं, पर उस ज़र्रे को मेरा दामन, गवारा नहीं था| सदाओं पे एक अजनबी ने पलट कर देखा, जिसे हमने तो कभी पुकारा भी नहीं था| उसकी आवाज़ की लर्ज़िश बता रही है, वो जो अपना था, अब हमारा नहीं था| जिस शक्स को अपने सहारा दिया,

कल कर लूँगा

अपनी बात पर यकीं, कल कर लूँगा, इस ख्याल को ज़मी, कल कर लूँगा| तन्हाई में जलता है हर लम्हा, उसकी यादों को हसीं, कल कर लूँगा| कितने रिश्ते भुला दिए इश्क में, अपनों को अज़ीज़, कल कर लूँगा| मुस्कुरा कर मिलते हैं जो आज भी, उनकी दोस्ती को तस्लीम, कल कर लूँगा| वो भी

याद है मुझको

छत पे सितारों की आराईश, याद है मुझको, सूखे फर्श पे, यादों की बारिश, याद है मुझको| हातों पे बिखरी लकीरों का सबब मुझको नहीं, मुक्कदर की वो हसीन साज़िश, याद है मुझको| दीवारों पे लटके ख्वाबों पे गर्द है लेकिन, दिल की हर ख्वाइश, याद है मुझको| यूँ तो ज़ीस्त से कोई मरासिम नहीं

बातों ही बातों में

बातों ही बातों में, कट गयी ज़िन्दगी मेरी, कितने रिश्तों में, बट गयी ज़िन्दगी मेरी| अपनी सुध थी ना ज़माने की खबर, इश्क के बाज़ार में, लुट गयी ज़िन्दगी मेरी| बातों ही बातों में, कट गयी ज़िन्दगी मेरी… कुछ वक़्त का तकाज़ा था, कुछ हालात की मजबूरी थी, हर रोज़ बदल गयी, ये शक्सियत मेरी|

तन्हा जाम

एक हम ही नहीं अकेले, तेरे मयखाने में साकी, महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे| मंजिल पर खड़े सोच रहा हूँ, सफ़र में, कुछ इससे हंसीं मकाम भी थे| महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे… मेरे जूनून को समझ कौन पाता, यारों में कुछ संगदिल, तो कुछ अक्ल के गुलाम भी थे|