कविता

बहते बहते

कह दे के देर ना हो जाए कहते-कहते, ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते| फिर ज़ख्म खाने की आदत हो जाएगी, गर यूँ ही खामोश रहा तू सहते-सहते| ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते… हुनर नहीं बस नवाज़ा है खुदा ने, लिखता हूँ ख्याल अपने यूँ ही बैठे-बैठे| ये किनारा भी न छूट

कोई धार तो मुझे बहा ले!

कोई धार तो मुझे बहा ले, कब तक बैठूं नदी किनारे| ऊब गया हूँ देख-देख कर, बहता पानी, रुके किनारे| विचारों का प्रवाह निरंतर, मैं की खोज में भटकता अंतर| या इस कंकड़ को जल बना ले, या इस कंकड़ को तल बना ले| कोई धार तो मुझे बहा ले, कब तक बैठूं नदी किनारे…

आँखें खोल कर देख!

ज़हन से ख्याल झाड़ कर देख, डर्र की आँख में झाँक कर देख| जिंदिगी से खुद को मांग कर देख, अपने वजूद को पहचान कर देख| लम्हे को कभी बाँध कर देख, वक़्त के दरिये को थाम कर देख| हदों की सरहद को लांघ कर देख, हिम्मत को सर पर बाँध कर देख| खुद को

कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ

हर दिन अपने लिए एक जाल बुनता हूँ, कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ| हर रोज़ इम्तिहान लेती है जिंदिगी, हर रोज़ मगर मैं मोहब्बत चुनता हूँ| कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हू… बहुत दूर चला आया हूँ कारवाँ से, तन्हा रास्तों में एक हमसफ़र ढूंढता हूँ| कभी ज़हन,

अधिकार नहीं मिलता

कहीं माँ का दुलार नहीं मिलता, कहीं बाप का प्यार नहीं मिलता | कुछ अभागि औलादें ऐसी भी हैं, जिन्हें अपना अधिकार नहीं मिलता | उम्र भर ढूंढते फिरते हैं बेगानों में, मगर कोई तलबगार नहीं मिलता | जैसे किसी वीरान पड़े मकां को, बरसों किरायेदार नहीं मिलता | मौत से एक लम्हें का भी,

बादल

कहने को चाँद से कब मिला है बादल, देखो तो चाँद से कब जुदा है बादल| जूनून ए इश्क की इन्तहा है बादल, दिल ए आशिक की दुआ है बादल| काली रात में चांदनी का टीका है बादल, अपने चाँद के बगैर कितना फीका है बादल| चाँद के आँचल में लिपटकर रोया है बादल, इतनी

धड़क रहा हूँ

मैं बदल गया हूँ, मैं बदल रहा हूँ, सबकी निगाहों को क्यों, मैं खटक रहा हूँ| मुझ में क्या था, जो अब नहीं है| मुझ में क्या है, जो पहले नहीं था| मैं तब भी धड़क रहा था, मैं अब भी धड़क रहा हूँ|

सावन मेरे

लौटे नहीं हैं परदेस से साजन मेरे, तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे| अब आये हो तो दर पर ही रुकना, पांव ना  रखना तुम आँगन मेरे| तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे… तेरी ये गडगडाहट, तेरी ये अंगडाईयां, इनसे मुख्तलिफ नहीं हैं मेरी तन्हाईयां, चाहे तो बहा ले कुछ आंसूं

एक दिवाली तुम मना लेना

एक दिवाली तुम मना लेना, एक दिवाली मैं मना लूँगा| लौट कर ना ये रात आये, लबों पर ना ये बात आये, एक दामन तुम भीगा लेना, एक दामन मैं जला लूँगा| एक दिवाली तुम मना लेना, एक दिवाली मैं मना लूँगा… इस मातम का सबब नहीं है, क्यों जिंदिगी का अदब नहीं है, एक

रुक जा यहाँ

रुक रुक, थोडा रुक जा यहाँ| ये वक्त नहीं अब आने का| देख देख, सब देख ले यहाँ| देख ले रंग ज़माने का| लड़ लड़, लड़ले सबसे तू, असर क्या है आग लगाने का| सीख सीख, सीख ले गुलों से, राज़ हँसते हुए मुरझाने का| डूब डूब, डूब जा मय में, ज़रिया है सब भूल