ख्याल

ख्वाब देखा न करो

ख्वाब देखा न करो, खुली आँखों से, इसकी कीमत देनी होती है, अधूरी सांसों से| हकीकत बदलती नहीं बस धुंधला जाती है, लकीरें कहाँ मिटती हैं, किसी के हाथों से| ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से… आदमी अकेला था और अकेला ही रहेगा, क्या उम्मीद लगाई है तुमने रिश्ते-नातों से| ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से… सच को महसूस करो और सच रहने दो, इसे चेहरा न दो ज़माने की फरेब बातों से| ख्वाब देखा

बज़्म ए ख्याल – 18

कुछ कमी ज़रूरी है वफ़ा में, दर्द से ही तो मुकम्मल होती है मोहब्बत| तुम भी शीशे की असलियत जान ना पाए, बेज़ुबान है पर बेनज़र नही है वो| खुदी बिखर गयी है चारों तरफ, अरसों में खिला है ज़हन मेरा| हर लफ्ज़ की सदा हुई है सवाल सी, चल के हो गयी है बज़्म

बज़्म ए ख्याल – 17

महंगी नहीं है ख्वाबों की ताबीर, बस एक जिंदगी की कमी है| पल पल का हिसाब जोड़ा, तो भी ज़िन्दगी ना मिली| जाने क्या अदा है इसकी तुममें घुल जाने की| उनसे क़ैद-ऐ-मोहब्बत ना देखी गयी.. तो ज़माने ने इसे सूली पर लटका दिया| अब महफ़िलों से लो उठ चले हम, सुना है कोई नया

बज़्म ए ख्याल – 16

अनकही समझने की अदा जाती रही, हमने घुटने टेक दिए लफ़्ज़ों के आगे| यूँ तो ओढ़ रखी थी हमने चादर ज़माने वाली, उसकी आँखों में देखा तो शरमिंदा ज़रूर हुए| ना पूछ साहिल कैसे डूबा मैं, तूफ़ानो की ज़िद थी और हम मगरूर रहे| दिलों के फ़ासले दिलों को मंज़ूर हुए, इतने करीब होकर भी

बज़्म ए ख्याल – 15

तुम्हें दिया हुआ वादा निभा रहा हूँ, मैं टूट कर भी मुस्कुरा रहा हूँ| क्या बात है दिन में ही जवान है बज़्म तेरी, तेरा साथ रहे और यूँ ही महकते रहे नज़्म मेरी| अगले सावन रोयेगा वो बादल मुझको, बह गया है मुझसे दूर जो हवाओं में| काश होती तुझसी मेरी भी फ़ितरत ‘वीर’,

बज़्म ए ख्याल – 14

अब हर सज़ा को तैयार हूँ, जुर्म-ऐ-मोहब्बत का गुनहगार हूँ| अब दूरियां किधर अब फासला कहाँ, मैं कहाँ और तेरा फैसला कहाँ| भूल जाऊं वो सारी बातें कैसे, तू कहाँ और मेरा हौसला कहाँ| ऐसे भी हमने वक़्त गुज़ारा है, तेरे नाम से खुद को पुकारा है| मुझे वो याद आया बरसों के बाद, मैने

बज़्म ए ख्याल – 13

आ जाओ की देर ना हो जाये, तुम्हें कहीं आने में| क़ज़ा को बड़ी जल्दी है, हमें अपना बनाने में| अब मैं हूँ और चंद लफ्ज़ हैं, आरजू ले गयी सबकुछ जो दरमियाँ था| कहीं भीग ना जाए पलकों का दमन, लो छलक जाते हैं हम उन आँखों से| तेरी खुशबू से महक रहा हूँ,

बज़्म ए ख्याल – 12

ऐसा है अपनी फिराक का फ़साना ‘वीर’, सच पूछो तो हम को इंतजार-ए-विसाल नहीं| उम्मीद मैंने भी छोड़ दी है ‘वीर’, गर तुझे अपने हौसलों पर एतबार नहीं| तुम्हारे दिल का सुकून, मेरे इख्तियार में नहीं, शरमिंदा हूँ के असर इतना, मेरे प्यार में नहीं| मेरा हौसला जब चुभने लगा उन आँखों को ‘वीर’, हमने

बज़्म ए ख्याल – 11

मोहब्बत करते-करते तू बंदगी कर बैठा है, करीब आते-आते तू खुद को खो बैठा है| जब तलक बेपरवाह था ठीक ही था, अब सोचता है मुझे, तो मजबूरी की तरह| वो पहले सा हौसला ‘वीर’ में नहीं, घुटने टेक देता है अब जिंदगी के आगे वो| उलटे पांव ना चल सका जज़्बातों का मुसाफिर, जाने

बज़्म ए ख्याल – 10

चंद रंगों में सिमटी है तस्वीर हसरतों की, कुछ तेरे चेहरे की हैं, कुछ मेरी आरजू की| कहाँ ले जायेगा ये सफ़र अब मुझे ‘वीर’, हर मील के पत्थर पर मंजिल कोई नयी लिखी है| कहीं बादलों में ही है मेरा आशियाना ‘वीर’, ये ज़मीन की हकीकत बेगानी सी लगती है| पिंजरा ही ले उड़ा