Category: ख्याल

बज़्म ए ख्याल – 9

मायूस दिलों में उम्मीद जगाई जाए, वीर चलो इस बार ऐसी ईद मनाई जाए| मुफ़लिसी ने सितम ढाया है जिन पर, उन चेहरों पर मुस्कुराहट सजाई जाए| जुनून की इंतहा का इल्म है ‘वीर’ को, उसने सिर्फ रास्ता बदला है, हौसला नहीं| गीला ना रह जाए तुझे अपनी ज़िन्दगी से ‘वीर’, एक कोशिश लाज़मी है

बज़्म ए ख्याल – 6

अभी एक उम्र बाकी है तुझे प्यार करने को, अभी तो मैंने सिर्फ खुद को गवाया है| कुछ नए ख्वाब देखने का मौसम आया है, हमने फिर उन्हीं उम्मीदों से घर सजाया है| मुंतजिर के अब शाम खिलने को है, एक शायर से उसकी नज़्म मिलने को है| मैने तो वक़्त को थाम दिया है

बज़्म ए ख्याल – 7

होठों पर फिर घिसी हुई बातें, करवट ले लेकर गुजारी हुई रातें| लिखकर दर्द अपना सुकून तलाश ना कर ‘वीर’, सर झुक जाएगा उसका अपनी बेबसी के आगे| हवाओं से बातें और रंगों की जुबान, उसके इख्तियार में क्या नहीं है ‘वीर’ बता| भूल जाते हैं करार वो, दिन के शोर में ‘वीर’, हम भी

बम ब्लास्ट

अपनो की खैरियत जान कर तसल्ली तो हुई मगर, दिल डूब गया सोच कर उन चंद कम-नसीबों का हाल| ना राम का भक्त था ना अल्लाह का बंदा, वो अकेला कमाने वाला था, उसकी यही पहचान थी| इस बात पर हैरत होना लाज़मी है ‘वीर’, पूरा समंदर है सब्र और हौसलों का इस शहर में|

बज़्म ए ख्याल – 5

उनको मामला समझाने का क्या फ़ायदा ‘वीर’, उनका ज़िन्दगी जीने का है अपना क़ायदा ‘वीर’| एक तरफ हवाओं का रुख़ है, एक तरफ लहरों का जुनून| कशमकश में हूँ, डूब जाऊं या बह चलूं| ये सच है ‘वीर’ इसको निगल जाओ तुम, घर के लोगों ने ही घर में आग लगाई थी| ख़ैरियत भी ना

बज़्म ए ख्याल – 4

वो ज़माना ही कुछ और था दिल मेरे, हमें मोहब्बत के सिवा और कोई काम न था| शब-ए-फिराक़ का ये आलम क्या बयाँ करूँ, उसके ख्यालों ने फुरसत नहीं दी इंतज़ार की| मेरे बाद गर मुझे ढूंढता वो आये इस दर तक कभी, कह देना इसी चौखट पर गुज़ारा करता था, वो हर शाम अपनी|

बज़्म ए ख्याल – 3

आज तनहाई को कोई रंग नही दूंगा, देखूँ कितना फीका है ज़हन उसका| क्यों हाथ लगाया तूने ज़ख्म को ‘वीर’, देख क़यामत सी बरसी है दुनिया पर| जिंदिगी तुझसे वादा तो नहीं है , निभाऊंगा जब-तलक़ मुमकिन हुआ| ये भी मुमकिन है की लौट ना सकूं कभी, ये भी जायज़ है की तुम इंतज़ार ना

बज़्म ए ख्याल – 2

सोय हुए अरमान फिर जागेंगे ज़रूर, तुमसे बेवफ़ाई का सबब मांगेंगे ज़रूर| रखकर निगाह में तस्वीर ख्वाब की, एक रात गुज़ार दी हमने बेताब सी| चेहरे बदल-बदल के मिलते हैं मुझसे दर्द ‘वीर’, एक ही जज़्बात ने नक़ाब पहने है कई रंग के| माना के मुश्किल बहूत है ये इम्तहान, हम भी रखते हैं दोस्त

बज़्म ए ख्याल – 8

किसी को हमसफ़र नहीं मिला, और किसी को रास्ता, तमाम शहर ही किसी को ढूँढता मिला| जिक्र आया तो था मेरा, उनके किस्से में, ये बात और के मैं बेनाम ही रहा| मेरा खुदाई से कभी कोई नाता नहीं था ‘वीर’, मुझे जो भी भटकता मिला खुदा सा लगा| मेरी मोहब्बत के कई इम्तहान आते

बज़्म ए ख्याल – 1

तुम सच हो ये मेरा गुमान ही सही, मैं झूट हूँ ये तेरा ईमान ही सही| मैं अपने लफ़्ज़ों का हिसाब लगता हूँ, चंद ही हैं इन ख्यालों की भीड़ में| अंधेरों से झूझता हूँ, तो सवेरे नाराज़ हो जाते हैं, क्या कीमत दूं तुझे ए नींद बता| कुछ गुज़र कर भी बाकी है, कुछ