नज़्म

आमद

खैर इस बार उसका होना अजीब न था.. हाँ अजीब था उसका बेवक्त आना| सहर से सतह पर कोई नमी के निशां नहीं थे| और सुबह से बच्चों की किलकारियां कानों में शहद घोल रही थी| एक खूबसूरत दिन अंगड़ाई लेकर बिस्तर से उठा था| दोपहर की भाग-दौड ने फुर्सत को बैठने का मौका ही नहीं

तुम रोना मत

अपनी मजबूरियों पर, दिलों की दूरियों पर, रात की बेनूरियों पर, तुम रोना मत| अपनी तनहाइयों पर, माज़ी की परछाइयों पर, ज़माने की नादानियों पर, तुम रोना मत| दिल की मायूसियों पर, दर्द की खामोशियों पर, इन साँसों की बरबादियों पर, तुम रोना मत|

कुछ मेरी सुन

खामोश रहकर यूँ दिल ना जला, कुछ मेरी सुन कुछ अपनी सुना| क्या हुआ? क्या कहा किसने? लगता है तू खुद से जुदा| खामोश रहकर यूँ दिल ना जला…

तुम आज की बात करो

तुम आज की बात करो| आज जो जुदा है कल से| आज जो पहले कभी नहीं आया है| आज जो फिर कभी नहीं आएगा| यूँ न जीस्त बरबाद करो! तुम आज की बात करो| आज रात ने नया आफताब बनाया है| आज दिन ये नया महताब बनाएगा| तुम भी कुछ नया, कुछ मुख्तलिफ करो| यूँ

कभी यूँ भी हुआ

कभी यूँ भी हुआ के, रास्ते मंजिलों से जुदा हो गए| जलकर आग-ए-कुर्बत में, हम एक रोज़ धुआं हो गए| कोई और नहीं, हम ही दुश्मन थे खुद के| अपना गिरेबान झाँका, और गुनाहों के खुदा हो गए| इबादत और इश्क में, फासला रखना ज़रूरी था| इतना माँगा तुझे हमने, मिसाल-ए-दुआ हो गए| मैं तुमसे

पहचाना सा दर्द था

पहचाना सा दर्द था, मिल चूका था इसे कई साल पहले| भरा हुआ ज़ख्म, फिर अचानक सांस लेने लगा| मानो किसी टूटी हुई टहनी में जडें निकल आयी हों… ज़हन घबराया था, फिर उसी आहट से| पिछले मौसम बहूत कुछ छीना था इसने मुझसे| मेरे दो चेहरे, दो हिस्से हो गए थे| आज और कल,

तेरी सादगी

बूंदों में सब डूब सा गया है, मुदत्तों में आज बादल पिघला है| और मैं तुमको अपने में समेटे, नम ज़हन को शाम होते देख रहा हूँ| इस साहिल से उस समंदर तक, जो दरमियाँ है, वही इस आंख से अश्क तक भर गया है| दिखता तो है कोई अक्स धुन्दला सा.. तुम हो या

तुम सब कुछ तो जानते हो

मेरे ज़बीं की शिकन, मेरे लफ़्ज़ों की काँप, मेरे झूट की तड़प, मेरे सच की आवाज़, तुम सब पहचानते हो, तुम सब कुछ तो जानते हो| मेरे गम की रातें, मेरे ज़हन की बातें, मेरे दर्द की सिसकी, मेरे हद की हिचकी, तुम सब पहचानते हो, तुम सब कुछ तो जानते हो| मेरे कदमों की

जिस्म से रूह तक

जिस्म से रूह तक सब लडखडाता है, जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है| फिर संग लिए अपने कांधों पर, कोई दीवाना घर नया बनाता है| जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है… अपने अश्कों की कद्र उसे कब थी, उसकी राहों में फूल बिछाता है| जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है…

जहाँ हम मिले थे

जहाँ कुछ लम्हें, मेरा हिस्सा बन गए| जहाँ लम्हों में, सदियाँ गुज़ार गई थी| जहाँ तेरी कसक मेरी तलाश थी| जहाँ एक लहर समुन्दर बन गयी थी| जहाँ खुदी सिर्फ एक खिलौना थी| जहाँ वहम का वजूद नहीं था| जहाँ सही गलत के दायरे खोखले थे| जहाँ दर्द मोहब्बत में बिखरा था| जहाँ आरजू सिसकती