Category: नज़्म

लंगड़ा वक्त

यादों के बोझ से वक्त लंगड़ा गया है! घड़ी के दो काँटों की बैसाखी लिए.. शाम से रेंग रहा है यहाँ| इसके हर कदम की आहट साफ़ साफ़ सुनाई देती है| यही वक्त था जो हमारे हाथों से यूँ फिसल जाया करता था| कैसे ख़ामोशी से ये अपने तेज कदम रखता था| आकर देखो, मैंने

आईने में

फिर सर झुकाये दिखे हम आईने में, फिर खुदको छुपाये दिखे हम आईने में| जो अक्स धुंधला दिया वक्त ने, उससे फिर घबराये दिखे हम आईने में|

मैं इनका खुदा हूँ

ये सब जो भागता है नज़रों में.. ये चेहरे जो बार बार देखते हैं मेरी तरफ.. ये रिश्ते जो अक्सर बांधते हैं मुझे अपने दामन से.. ये ख्याल जो मुझे अक्सर मायूस करते हैं… ये लफ्ज़ जो भटकते है अनाथ बच्चों से.. ये इश्क जो मुझे दीवाना बनाता है.. ये बंदगी जो मुझे खोकला करती

एक दिल है

एक दिल है, और हसरत कितनी| एक खुदी है, और बरकत कितनी| एक इश्क है, और हरकत कितनी| एक शख्स है, और कुर्बत कितनी| एक बिस्तर है, और सिलवट कितनी| एक नींद है, और करवट कितनी| एक मरासिम है, और फुर्क़त कितनी| एक दरवाज़ा है, और खटखट कितनी| एक जिंदिगी है, और फुर्सत कितनी| एक

तेरे अहसास से

जकड़ता है दर्द अंदर मुझे, पिघलता हूँ तेरे अहसास से… बरसों से जमी है नमी आँखों में, सिमटता हूँ तेरे अहसास से… थी ख़ामोशी की आदत बरसों से मुझे, थोडा डरता हूँ तेरी आवाज़ से… कहीं बेखुदी मेरी ना पी जाये तुझे, मैं बिखर ना जाऊं तेरे अहसास से..

नसीब ना हुआ

उन ग़ज़लों को स्याही का कफ़न नसीब ना हुआ, उन नज्मों को आवाज़ का मज़ार नसीब ना हुआ.. उन रिश्तों को नाम का लिबास, उन अश्कों को दामन-ए-यार.. नसीब ना हुआ.. उन कहानियों को याद का सहारा.. उन लम्हों को ज़ुल्फ़-ए-यार.. नसीब ना हुआ.. उन सावलों को जवाब, उन जवाबों को इंतज़ार… नसीब ना हुआ..

साथ हूँ तुम्हारे

भीड़ में गुम होता एक शख्स… मेरे कुछ रंग अपने चेहरे में लगाये| मुझसा दिखता है| ओझल होता उसका साया घुलता जाता है लोगों में| मुझे अंदर खलिश सताती है| सोचता हूँ भाग के उसे पकड़ लूँ| कुछ उसके रंग अपने चेहरे पे लगा लूँ| रोकता हूँ खुद को.. कहता हूँ बस शायद मोहब्बत है|

हम बच्चों से हो गए

खामोश हम नाचते रहे ख्यालों के साथ| कुछ ख्यालों को ख्वाब के लिबास दे डाले| कुछ ख्यालों को हसरतों का मुखोटा| कुछ खमोशियों को इकरार के नज़र कर दिया| कुछ रास्तों को मंजिल मान लिया| कुछ मुस्कुराहटों को मौसिकी| नज़रों के खेल को न्योछावर कर दिया ज़ुबान पर| लम्हों को यादों से सहेज के अपने

तलाश

दीवारों में कुछ छेद थे… इन्हें आज भर दिया| अब इंतज़ार इनसे लिपट तो सकता है, मगर ख्यालों तक नहीं पहुंचेगा| दर्द चुनवा दिए हैं…यह अब ज़हन में क़ैद रहेगा| किसी चरागाह की तलाश नहीं है| अब इसे भी घुटन नहीं होती| मायने जिंदिगी के मुझे नहीं सताते… बेमतलब ही सही वजूद| अब अपनी खुदी

घर को जाता हूँ

घर को जाता हूँ… बहुत कुछ बिखरा है वहाँ, टुकड़े हैं मेरे कुछ फर्श पर| दीवारों पर धबे हैं मेरे झूट के| फीका पड़ गया हैं इनका रंग… इन्हें धोना है | घर को जाता हूँ… मेरी तस्वीरों पे गर्द है| किताबें उसूलों की डेस्क में बंद है| सपने सीलिंग पे लटके लटके थक गए