ये कैसा लहजा है

तेरी दिल्लगी से आ पड़ती है मेरी जान पर,
ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर|

अब हुआ है तो इज़हार ए वफ़ा भी कर ले,
रुकता नहीं है देर तक तीर कमान पर|
ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर…

कोई दौड़ नहीं ये राह-ए-जीस्त है ‘वीर’,
खुद को थामना पड़ता है ढ़लान पर|
ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर…

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