असां नहीं था

रूठी जिंदिगी को मनाना असां नहीं था,
टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था|

राह भी मुश्किल थी और मंजिल धुंधली,
लड़खड़ाते हुए चलते जाना असां नहीं था,
टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था…

चुभते काँटों से थे मेरे ख्वाब अधूरे,
होसलों के फूल खिलाना असां नहीं था|
टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था…

बुलाती रहीं हमें बहुत बरसों तलक,
उन गलियों को भुलाना असां नहीं था|
टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था…

रिश्ता तो कब का ही बिखरा चूका था,
अपनों को गले लगाना असां नहीं था|
टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था…

एक दीया हवा से लड़ता रहा रात भर,
खुदको कतरा कतरा जलाना असां नहीं था|
टूटे सपनों को सजाना अंसा नहीं था…

चीख कर मैंने खामोश तो कर दी हसरतें,
दिल की आवाज़ दबाना असां नहीं था|
टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था…

यूँ बदनाम था मेरी बंदगी का किस्सा,
एक नया खुदा बनाना असां नहीं था|
टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था…

बहूत मायूस था जिंदिगी से वो ‘वीर’,
रोते दिल को हसाना असां नहीं था|
टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था…

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  • sunil kumar

    खुबसूरत गज़ल हर शेर दाद के क़ाबिल, मुबारक हो

    • @सुनील – होसला अफजाई के लिए शुक्रिया !

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