अब भीगेंगे सावन में

अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक,
गीली मिट्टी के महक से.. तेरे दामन की छाओं तक|

काली सड़कों पर पानी भी काला है,
कोई ले चले हमें.. इस शहर से उस गाँव तक|
अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक…

ये दौड़ किसी पागलपन से कम तो नहीं,
आदमी भागता है एक तनाव से दुसरे तनाव तक|
अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक…

इस पार पहुँचते ही.. उस पार हो चल दिए,
दास्तां सिमट गयी अपनी.. इस नाव से उस नाव तक|
अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक…

0.00 avg. rating (0% score) - 0 votes
%d bloggers like this: