अंगार ढूँढता हूँ

dhoondhta-hoon

कैसा कर्ज़दार हूँ के सूद लिए साहूकार ढूँढता हूँ,
जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूँढता हूँ|

न शहर बचा, न घर.. और न घर में रहने वाले,
तन्हाई की धुप में सर छुपाने को दीवार ढूँढता हूँ|
जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ…

एक मुद्दत गुज़र गयी है यूँ तन्हा जीते हुए,
जो रुखसती में दिया था उसने वो इंतज़ार ढूँढता हूँ|
जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ…

अपनों के शहर में आखिर अपना कुछ भी नहीं,
अब बेगानों की महफ़िल में बचपन का यार ढूँढता हूँ|
जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ…

वक्त से गुम हुए हैं मेरे कई साज़-ओ-सामान,
इस बदलाव की आंधी में अपना गुबार ढूँढता हूँ|
जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ…

जिनके सीनों में भी अब कोई हरकत नहीं होती,
मैं उनकी आँखों में अपने लिए प्यार ढूँढता हूँ|
जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ…

इन वीरानो में कहीं दब के रह गयी है वफ़ा,
जो हुआ करता था मेरा वो गुलज़ार ढूँढता हूँ|
जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ…

आधे रास्ते तक पहुंचा हुआ एक मुसाफिर हूँ ‘वीर’,
खंजर से चोट खा चुका अब तलवार ढूँढता हूँ|

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