अपने कई रास्तों में भटका हुआ

मुख्तलिफ नहीं हैं मुझ से किरदार मेरी जिंदगी के,
ये मैं ही हूँ अपने कई रास्तों में भटका हुआ|

खड़ा हूँ अगर मैं तो फिर कौन चल रहा है,
किस तरफ ले जा रहा मुझे लहरों में बहता हुआ|
ये मैं ही हूँ अपने कई रास्तों में भटका हुआ…

ये रास्ता ही मंजिल हो, इस बेसबब से सिलसिले का,
लकीरों में बंधा होकर मैं इन तूफानों से लड़ता हुआ|
ये मैं ही हूँ अपने कई रास्तों में भटका हुआ…

गर अश्क बनकर बह जाऊं, तो जीस्त मुकम्मल हो,
एक चुभते कतरे सा मैं उन आँखों में अटका हुआ|
ये मैं ही हूँ अपने कई रास्तों में भटका हुआ…

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