आवारगी हमें कहाँ ले आई

ढूँढ रहे थे हम किसे वीरानो में,
आवारगी हमें कहाँ ले आई|

है कोई वाकया इन सिलसिलों में,
फितरतें हमें कहाँ ले आई|

तपता सूरज आंख में चुभता रहा,
रात के सन्नाटों ने ख़ामोशी चुराई|

झुझते रहे हम करवटों से रात भर,
हर सिलवट ने आवाज़ हमें लगाई|

मत पूछ के कैसे लिखता है ‘वीर’,
पूछ उसे दुनिया क्यों रास ना आई|

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