बात निकली

कहते कहते जब बात निकली,
करहा के हमसे आह निकली|

बंद ताले जब खोले हमने,
गुजरी हुई हर साँस निकली|

देखते देखते सहर हो गयी,
आँखों आँखों में रात निकली|

बंदगी की बाज़ी जीत तो गया,
इसमें खुदी की मात निकली|

कहाँ है तू मेरी हमनफस बता,
कहने को तो तू मेरे साथ निकली|

इसे मंजिल समझने कि भूल थी ‘वीर’,
देख इससे गुजरती कितनी राह निकली|

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  • Chandrama

    I usually love what you do to the last two lines of your thought. Its a jist of an entire verse in itself. Beautiful!

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