बगावत कर दी है

इतने सिरों का छोर, पकड़ा है, एक अकेली जान से,
बगावत कर दी है ज़हन ने, दिल-ए-परेशान से |

डूबने लगता है, इसकी दस्तक से घबरा के दिल,
तन्हा रात का खौफ, सताने लगता है शाम से |

फिर भी हम, नहीं करते कभी सच कबूल,
के अपने ही घर में जीये जा रहे हैं, मेहमान से |

हासिल है पल भर का सुकून, हर नई ग़ज़ल से,
और कुछ नहीं मिलता, इस बेलगाम दीवान से |

अब तौबा कर ले इस जूनून-ए-सुखन से ‘वीर’,
वरना जायेगा का एक रोज़, तू अपनी जान से |

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  • sangeetaswarup

    खूबसूरत गज़ल 

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