बर्दाश्त नहीं होती

मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती|
ये नकाबों की बिमारी, बर्दाश्त नहीं होती|

मैंने देखे हैं तुम्हारे कई सुन्दर रंग,
मुझसे तुम्हारी अदाकारी, बर्दाश्त नहीं होती|
मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती…

हमने फूँका है खुद को वफ़ा में मगर,
अब तंज की चिंगारी, बर्दाश्त नहीं होती|
मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती…

अब मुझसे मुंह फेर कर जाता कहाँ है,
तेरी गैरों पर दिलदारी, बर्दाश्त नहीं होती|
मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती…

जो बीत गया वो अब भी रुलाता क्यों है,
माज़ी की जवाबदारी, बर्दाश्त नहीं होती|
मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती…

‘वीर’ लेकर आ कोई नया मर्ज़ ज़माने का,
तेरी इश्क की बीमारी, बर्दाश्त नहीं होती|
मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती…

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