बेखुदी से

तिनका-तिनका मर रहे हैं खुशी से,
हमें क्या कुछ ना हासिल हुआ बेखुदी से|

हम दीवार की दरारों से झांकते हैं उन्हें,
दिखते हैं मेरे जनाब बिखरे-बिखरे से|
हमें क्या कुछ ना हासिल हुआ बेखुदी से…

कुर्बतों का कहर बरपा इस कद्र ‘वीर’,
हाथ उठा मांग रहे हैं फासले सभी से|
हमें क्या कुछ ना हासिल हुआ बेखुदी से…

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