बेरुखी

धोखा है, इश्क है, दिल्लगी है,
कितनी हसीं उसकी बेरुखी है|

बहलाने वाले खो गए हैं कहाँ,
मुस्कुराहट उन्हें ढूंढती है|
कितनी हसीं उसकी बेरुखी है…

जान पहचान से होगा क्या,
सारी दुनिया लकीरों में सिमटी है|
कितनी हसीं उसकी बेरुखी है…

याद कर लेंगे फिर उसे ‘वीर’,
तन्हाई जिसे भूलती है|
कितनी हसीं उसकी बेरुखी है…

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