चांदनी का डर्र

अँधेरी तन्हा रात कितनी उदास बेठी है,
चांदनी डर्र से चाँद के पास बेठी है|

है मेरे रकीब चारो तरफ महखाने में,
वो जो एक महज़बीं मेरे पास बेठी है|
चांदनी डर्र से चाँद के पास बेठी है…

तेरा वजूद ही मेरी क़ज़ा का फरमान है,
जाम के साए में छुपकर प्यास बेठी है|
चांदनी डर्र से चाँद के पास बेठी है…

तुझसे मिलना था एक बार और ‘वीर’,
बेबसी की आह में वफ़ा की आस बेठी है|

चांदनी का डर्र
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