चंद लम्हों को

Painting - Sunset by river

चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं,
बनाने वाले गमों को भी, खुशियाँ बना लेते हैं|

न पंख बचे और अब न होसला उड़ने का,
शाम होते ही, हम कागज़ पर तितलियाँ बना लेते हैं|
चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं…

घुटने टेक दिए हैं हर हसरत ने आते-जाते,
अपने अंदर के डर्र को, हम मजबूरियाँ बना लेते हैं|
चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं…

अब तेरे जैसा कोई कहीं मिलता कहाँ है,
जिसका साया मिले, उससे नज़दीकियाँ बना लेते हैं|
चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं…

कुर्बतों से न जाने क्या डर्र है सभी को,
पास आते ही किसी के, दूरियां बना लेते हैं|
चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं…

ये इलज़ाम बिलकुल लाज़मी हैं हम पर,
एक जिंदिगी से हम कई जिंदगियाँ बना लेते हैं|
चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं…

इन काले बादलों सा हुनर-ए-सुखनवरी है ‘वीर’,
अपने गमों से हम शेर की बिजलियाँ बना लेते हैं|

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