छुपायें तो छुपायें कैसे

तुमको सबब-ए-गम बतायें तो बतायें कैसे,
तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे|

अब तलक ढोता हूँ गिरे घर के पत्थरों को,
फिर कोई नया घर बनायें तो बनायें कैसे|
तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे…

जुनून-ए-बेखुदी ने रुसवा किया यारों को,
तेरा कोई हमदर्द अब लायें तो लायें कैसे|
तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे…

अपनी अंधेरी कब्र में क़ैद हूँ इन दिनों,
तुझको अपने पास बुलायें तो बुलायें कैसे|
तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे…

तुमको अंदाज़ा बहूत है धडकनों का ‘वीर’,
तुझे फिर गले लगायें तो लगायें कैसे|
तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे…

लिखी है अपने हाथों से किस्मत ‘वीर’,
किसी पर इलज़ाम लगायें तो लगायें कैसे|
तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे…

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  • लिखी है अपने हाथों से किस्मत ‘वीर’,
    किसी पर इलज़ाम लगायें तो लगायें कैसे|
    तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे…

  • बहुत अच्छी लगी आपकी रचना। धन्यवाद।

  • amit chandra

    behtar rachana aur sunder shabad sanjoyan. aabhar.

  • bahut sundar prastuti

  • तुमको अंदाज़ा बहूत है धडकनों का ‘वीर’,
    तुझे फिर गले लगायें तो लगायें कैसे|

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