दर्द ये एक गुमनाम सा है

ये वक्त इम्तेहान का है,
इश्क के अंजाम का है|

हो फना उसकी चाहत में,
इरादा इन्तकाम का है|

उसकी है कोई मजबूरी,
ख़ामोशी में पयाम सा है|

चल किसी नए शहर जहाँ,
नाम अपना गुमनाम सा है|

देर तलक तन्हा सोचना,
रोज़गार हर शाम का है|

घर तो कभी था ही नहीं,
सिर्फ पता मकान का है|

नयी नहीं है कहानी मेरी,
किस्सा ये आम सा है|

किसका ज़मीर है पूरा साफ,
हर कोई थोडा बदनाम सा है|

कोई ख्वाब नहीं बाकी,
जिस्म ये बेजान सा है|

ऐसे ही जिंदा रहना पड़ेगा,
क़र्ज़ उनके अहसान का है|

है जिंदिगी नहीं ये आखरी,
बस नाम एक मकाम का है|

उड़ते नहीं बादलों से ख्याल,
दिल बंद आसमान सा है|

काश होता कोई लफ्ज़ ‘वीर’,
दर्द ये एक गुमनाम सा है|

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  • है जिंदिगी नहीं ये आखरी,
    बस नाम एक मकाम का है|

    ऐसे ही जिंदा रहना पड़ेगा,
    क़र्ज़ उनके अहसान का है|

    है जिंदिगी नहीं ये आखरी,
    बस नाम एक मकाम का है|

    शाश्वत सत्य तो सब को पता होते हैं, पर जब उनकी अभिव्यक्ति काव्यात्मक और सटीक शब्दावली के साथ हो तो अंतरतम को आंदोलित कर जाते हैं …अच्छी गज़ल है …. सानुरोध, सविनय कहूँगा कि बहर और काफिया में एक दो जगह कमियां हैं पर गज़ल अपने भाव पूर्णतः पाठक तक पहुंचती है ….धन्यवाद आपका

  • Prayush Burde

    Veeru bhai, I like this kavita very much. Aap bahut achha likhte ho. Please likho hum padhne ko betab hai.

    Prayush

  • आपकी नयी गज़ल का इंतज़ार है ……. आशा है शीघ्र आशा पूरी होगी

    • वीर

      थोडा व्यस्त था| नई ग़ज़ल आपके नज़र है…

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