डर मत वीर

डर मत वीर तू इससे भी उभर जाएगा|
तेरे ज़हर को पीकर ये लम्हा भी मर जाएगा|

रात रोते रोते तू बह गया अगर,
सारा जहान तेरे अश्कों से भर जाएगा|

काजल से काली सोच है तेरी वीर,
शैतान भी तुझसे डर जाएगा|

कोई है क्या वहाँ रास्ता देखता,
उठ के भला तू क्या घर जाएगा|

ऐसे रखा है ख्यालों को ओढ़ कर,
किसी रोज ज़हन इनसे सड़ जाएगा|

खड़ा रहूँगा अपनी तन्हा मंजिल पर,
और ज़माना कौसो दूर निकल जाएगा|

कतरा कतरा अपनी ज़मीन खोदता है ‘वीर’,
एक दिन बेखुदी में इसमें गड जाएगा|

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