एक सौदा अपनी पूरी कीमत का

मुझसे एक सौदा अपनी पूरी कीमत का कर ले जिंदिगी,
मुझे यूँ बार-बार किश्तों में जीना मंज़ूर नहीं|

तेरी अपनी रवायत है और तेरी अपनी ही फितरत,
तुझे हर हाल में कबूल करूँ, मैं इतना मजबूर नहीं|

तू बदलती है क्यों मेरा रास्ता हर नये मोड पर,
मेरी मंजिल तो मैं खुद हूँ, इसमें रास्तों का कसूर नहीं|

अपने पांव के नीचे हमेशा ज़मीन रखता है,
उसे नवाज़ा है खुदा ने बहुत, मगर वो मगरूर नहीं|

तुमसे ही रहता है रोशन चाँद का चेहरा हर रात,
तुम्हारे मुंह फेर लेने पर, ये नूर तो कोई नूर नहीं|

अपनी आखरी साँस तलक उसका मुन्तज़िर रहा ‘वीर’,
जो पास रहकर भी दूर है, जो दूर रहकर भी दूर नहीं|

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