हासिल के दायरे


तेरे नाम को हम कब रोते हैं,
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं|

ना रख कोई खलिश दिल में,
ख्वाब आखिर ख्वाब ही होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

यही तो दस्तूर है ज़माने का,
मिलकर दिल अक्सर जुदा होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

मुन्तज़िर ना छोड़ किसी को ‘वीर’,
तुझसे आवारा कब घर लौटे हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

थोड़ी बेवफाई जायज़ हैं ना ‘वीर’,
यार तो आखिर यार ही होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

0.00 avg. rating (0% score) - 0 votes
  • बहुत सुंदर रचना

  • बेहतरीन रचना!

  • बहुत खूब लिखा है. तमाम लोग दिल में किसी से मिलने की तमन्ना रखते हैं ,किसी को पाने की तमन्ना रखते हैं. खैर जानते हैं हम सब:
    किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
    किसी को जमी, किसी को आसमा नहीं मिलता…

    • वीर

      तेरे जहां में ऐसा नहीं की प्यार ना हो,
      जहाँ उम्मीद हो उसकी वहाँ नहीं मिलता|

  • raghulaughter

    मुन्तज़िर ना छोड़ किसी को ‘वीर’,

    तुझसे आवारा कब घर लौटे हैं|

    हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

    थोड़ी बेवफाई जायज़ हैं ना ‘वीर’,

    यार तो आखिर यार ही होते हैं|

    हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

    बहुत उम्दा लिखा है आपने वीर साहेब

%d bloggers like this: