हासिल के दायरे


तेरे नाम को हम कब रोते हैं,
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं|

ना रख कोई खलिश दिल में,
ख्वाब आखिर ख्वाब ही होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

यही तो दस्तूर है ज़माने का,
मिलकर दिल अक्सर जुदा होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

मुन्तज़िर ना छोड़ किसी को ‘वीर’,
तुझसे आवारा कब घर लौटे हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

थोड़ी बेवफाई जायज़ हैं ना ‘वीर’,
यार तो आखिर यार ही होते हैं|
हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं…

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