हिसाब की पीते हैं

हिसाब की पीते हैं जब-तलक होश रहता है,
वो कोई और है, जो सर-ए-महफ़िल बेहोश रहता है|

ए साकी तेरे इस जाम का हक भी अदा कर दूँगा,
रात अभी बाकी है, क्यों मुझे एहसान फरामोश कहता है|

तू भी कभी मेरे साथ पीकर देख रकीब,
तुझे भी समझ में आये, इश्क क्यों खामोश रहता है|

आप इस पैमाने की गुस्ताखी पर ना जायें जनाब,
हसीन हाथों से टकरा कर ये मदहोश रहता है|

पीते हैं तो ज़िंदा हैं अब तलक हम ‘वीर’,
वरना उम्र के इस मोड़ पर कहाँ जोश रहता है|

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  • sangeetaswarup

    बहुत खूब …. 

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