इन दिनों

तुम से आरजू मेरी कुछ नाराज़ है इन दिनों,
खामोश लब में क़ैद, कोई राज़ है इन दिनों |

जिंदिगी मगर थमी नहीं तुम्हारे बाद,
अंजाम का दूसरा नाम, आगाज़ है इन दिनों |

ग़ज़ल से रूठकर उस तक पहुँच भी जाऊं,
मगर उन हाथों में सुखन का साज़ है इन दिनों |

कभी दर्द ए दिल से तिलमिला उठते थे ‘वीर’,
अब उसी ज़ख्म पर हमें नाज़ है इन दिनों |

 

 

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