इश्क की गहराईयों में

इश्क की गहराईयों में खूबसूरत क्या है,
मैं हूँ, तुम हो और कुछ की ज़रुरत क्या है|

करके इश्क जिसने खुदको गवाया ना हो ,
उसकी जुबां क्या, उसकी नसीहत क्या है|
मैं हूँ, तुम हो और कुछ की ज़रुरत क्या है…

करे जाते हो सितम मुझपर मुस्कुराते हुए,
तुम्हारी रहमत क्या, तुम्हारी मसिहत क्या है|
मैं हूँ, तुम हो और कुछ की ज़रुरत क्या है…

बरसों खुदको बंद दरवाजों में क़ैद रखा है,
मेरा शौक़ क्या, मेरी फितरत क्या है|
मैं हूँ, तुम हो और कुछ की ज़रुरत क्या है…

मैं सपनो और ख्यालों का बाशिंदा हूँ ‘वीर’,
मेरा वजूद क्या, मेरी हकीकत क्या है|
मैं हूँ, तुम हो और कुछ की ज़रुरत क्या है…

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