इस शहर की दुकानों में

इस शहर की दुकानों में,
मुझे बेंच रहा है हुनर मेरा|
मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते,
और नीलाम हो रहा है सफ़र मेरा|

एक शख्स मेरे अन्दर मुझे,
जीस्त की मजबूरियां गिनाता है|
मैं ढल रहा हूँ बदलते सांचों में,
और बदनाम हो रहा है सफ़र मेरा|
मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते,
और नीलाम हो रहा है सफ़र मेरा…

वो कौन है जो अब मुझसे,
इन साँसों का हिसाब मांगता है |
मैं लिख  रहा हूँ अपनी खलिश  को,
और कलाम हो रहा है सफ़र मेरा |
मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते,
और नीलाम  हो रहा है सफ़र मेरा…

क्या सबब है इस वजूद का,
बस  मेरा खुदा ही जानता है |
मैं चल रहा हूँ राह-ए-मोहब्बत,
और मकाम हो रहा है सफ़र मेरा |
मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते,
और नीलाम हो रहा है सफ़र मेरा…

ये दिल किसी नकारा सा ‘वीर’,
एक उसी शख्स को मांगता है |
मैं उठा रहा हूँ हाथ दुआ में,
और कुर्बान हो रहा है सफ़र मेरा |

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  • sangeetaswarup

    बहुत खूब 

  • Deevasg

    इस शहर की दुकानों में,
    मुझे बेंच रहा है हुनर मेरा|
    Wowwww!!! 🙂

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