जाने क्या सोच कर रोज़ घर जाता हूँ

कितने रिश्तों में खुदको बंधा पाता हूँ,
जाने क्या सोच कर रोज़ घर जाता हूँ|

अनजाने से सफ़र के गुमराह रास्तों पर,
सबसे लड़ता हुआ किसी बेनाम शहर जाता हूँ|
जाने क्या सोच कर रोज़ घर जाता हूँ…

रात की ख़ामोशी में, ज़हन खाली करता हूँ,
दिन के उजालों में, दर्द से फिर भर जाता हूँ|
जाने क्या सोच कर रोज़ घर जाता हूँ…

लम्हा-लम्हा जिंदगी जीना कब सीखूंगा,
लम्हा-लम्हा मौत एक नयी मर जाता हूँ|
जाने क्या सोच कर रोज़ घर जाता हूँ…

मुझसे मेरे ख्वाबों की ताबीर ना पूछ,
मैं अपने ही ख्वाबों से अक्सर डर जाता हूँ|
जाने क्या सोच कर रोज़ घर जाता हूँ…

हर एक दिन एक नया सूरज उगता है,
हर एक दिन एक पुराना गम जलाता हूँ|
जाने क्या सोच कर रोज़ घर जाता हूँ…

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