जाने कब संभलोगे तुम

बार बार उस एक पत्थर से ठोकर खाते हो,
गिरना शौक है तुम्हारा, जाने कब संभलोगे तुम|

रोज़ उठते हो तुम नये होसलों के साथ मगर,
एक ज़माना गुज़र चला, जाने कब बदलोगे तुम|
गिरना शौक है तुम्हारा, जाने कब संभलोगे तुम…

अभी तुम्हारा खामोश रहना मुनासिब है ‘वीर’,
शोला अन्दर भड़का है, अब आग ही उगलोगे तुम|

और एक दिन वो आएगा, जब कल ना होगा,
आंखें मिलेगी क़ज़ा से, आखिरी दम भरोगे तुम|

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