जायज़ नहीं

हटा दे लफ़्ज़ों का नकाब अब,
इतनी पर्दादारी जायज़ नहीं ‘वीर’|

मोहब्बत अपनी जगह है,
इतनी वफादारी जायज़ नहीं ‘वीर’|

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