कमरे की दीवारें

कमरे की दीवारें क्यों घूरती लगती हैं,
पंखे की आवाजें क्यों डूबती लगती हैं|

दिन भर की थकान से मुरझाया हर गुल है,
ख्यालों की तितलियाँ क्यों उडती लगती हैं|
कमरे की दीवारें क्यों घूरती लगती हैं…..

नींद कोई ख्वाब है जिसे आँखों ने चुरा लिया,
पलकें बंद मगर हर तरफ रौशनी क्यों लगती हैं|
कमरे की दीवारें क्यों घूरती लगती हैं…..

सोचता रहता हूँ घंटों, खोजता रहता हूँ घंटों,
बीता लम्हा वही है तो तस्वीरें क्यों बदलती लगती हैं|
कमरे की दीवारें क्यों घूरती लगती हैं…..

किसी पर ऐतबार करता हूँ, गलती हर बार करता हूँ,
चोट पुरानी है मगर, खलिश नयी क्यों लगती है|
कमरे की दीवारें क्यों घूरती लगती हैं…..

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