ख्यालों के हुजूम से

ख्यालों के हुजूम से, तनहाइयों के गलियारों तक,
अपना सच ढूँढ रहा हूँ, मैं सोच के किनारों तक|

खुदा भी मिला है और काफ़िर भी मुझे,
मैं सिमट के रह गया हूँ, अपनी चार दीवारों तक|
अपना सच ढूँढ रहा हूँ, मैं सोच के किनारों तक…

मेरी आँखें गोया उसकी गुलामी करती हैं,
वो ही दिखता है मुझे, नज़र से नज़ारों तक|
अपना सच ढूँढ रहा हूँ, मैं सोच के किनारों तक…

एहसान मोहब्बत का रहा मुझ पर उम्र भर,
मेरे साथ रही वो, सवालों से जवाबों तक|
अपना सच ढूँढ रहा हूँ, मैं सोच के किनारों तक…

जिंदगी छोटी है मगर, ये सफर आसां नहीं,
एक उम्र का फासला है, कोख से मज़ारों तक|
अपना सच ढूँढ रहा हूँ, मैं सोच के किनारों तक…

मैं हर्फ़ – हर्फ़ संजो लेता हूँ उसके लिए ‘वीर’,
जो मिलता नहीं मुझे, दुआओं से किताबों तक|
अपना सच ढूँढ रहा हूँ, मैं सोच के किनारों तक…

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