खिज़ा

खिज़ा की नज़र हुई है महक ए गुलशन,
मैं हूँ झुलसा हुआ और वो मुरझाया हुआ|

एक से फ़साने जैसी है तमाम ज़िंदगियाँ,
हर शख्स दिखता है किसी का सताया हुआ|
मैं हूँ झुलसा हुआ और वो मुरझाया हुआ…

सबने ईंट के ढेर को ही घर समझा है,
सबने अपना एक पिंजरा है बनाया हुआ|
मैं हूँ झुलसा हुआ और वो मुरझाया हुआ…

सिर्फ तुम ही नहीं दर्द के मारे ‘वीर’,
देख कौन है यहाँ ना चोट खाया हुआ|
मैं हूँ झुलसा हुआ और वो मुरझाया हुआ…

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