लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए

हालात मचलते हैं बदलने के लिए,
लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए|

जो थोडा तू मेरे इन हाथों में लिख गया,
काफी है एक उम्र को तडपने के लिए|
लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए…

हर लड़ाई तेरी अपने आप ही से है,
इलज़ाम ना दो किसी को बदलने के लिए|
लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए…

क्या सोचते हो कहाँ जाना है तुम्हे,
रास्ते नहीं ढूँढ़ते भटकने के लिए|
लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए…

अच्छा ही हुआ वो ना टुटा ना रोया,
कुछ मिल गया फुर्सत में करने के लिए|
लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए..

ये क्या ठोकरों से घबरा गए तुम ‘वीर’,
चलते जाना ज़रूरी है कहीं पहुँचने के लिए|
लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए…

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