मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा

लौट के उसी दो राहे पर बार-बार पहुँचा,
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा|

सारी रात गुज़ार दी चंद लफ़्ज़ों के साथ,
मेरे सवाल से पहले उनका इनकार पहुँचा|
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा…

रूह की गहराईयों में राह तकती आंखें,
जहाँ तू नहीं पहुँचा वहाँ इंतज़ार पहुँचा|
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा…

होश न आया फिर होश जाने के बाद,
मैं गया किधर भी मगर कूचा ए यार पहुँचा|
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा…

डूब के जाना है ये तो मालूम था ‘वीर’,
नज़र नहीं आता कोई जो उस पार पहुँचा| *
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा…

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* ये इश्क नहीं असां बस इतना ही समझ लिजीये, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है…

मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा
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  • Deevasg

    Superb!!

  • Deevasg

    रूह की गहराईयों में राह तकती आंखें,
    जहाँ तू नहीं पहुँचा वहाँ इंतज़ार पहुँचा|
    Yeh Khoob kaha hai sahab!!

    • http://veeransh.com/ Veer

       @Deevasg :-) shukriya
       

  • yashodadigvijay4

    <i><B> शनिवार 11/08/2012  को आपकी यह पोस्ट <a href=http://nayi-purani-halchal.blogspot.in> http://nayi-purani-halchal.blogspot.in </a> पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों  का स्वागत है .                                       धन्यवाद! </B></i>

  • HimanshuJoshi

    मिलने का वादा कई बार किया हमसे
    वो तो न आये पर ख़त हर बार पहुंचा
     
    प्यार के दरिया में तो जहाज़ डूबा करते हैं
    मैं अनजान कागज़ की कश्ती पे सवार पहुंचा

  • sangeetaswarup

    बहुत खूबसूरत गजल