मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा

लौट के उसी दो राहे पर बार-बार पहुँचा,
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा|

सारी रात गुज़ार दी चंद लफ़्ज़ों के साथ,
मेरे सवाल से पहले उनका इनकार पहुँचा|
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा…

रूह की गहराईयों में राह तकती आंखें,
जहाँ तू नहीं पहुँचा वहाँ इंतज़ार पहुँचा|
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा…

होश न आया फिर होश जाने के बाद,
मैं गया किधर भी मगर कूचा ए यार पहुँचा|
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा…

डूब के जाना है ये तो मालूम था ‘वीर’,
नज़र नहीं आता कोई जो उस पार पहुँचा| *
मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा…

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* ये इश्क नहीं असां बस इतना ही समझ लिजीये, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है…

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