मैं न कोई मसीहा न कोई रहनुमा हूँ

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Photo by BurnAway

मैं न कोई मसीहा, न कोई रहनुमा हूँ,
मैं अपनी आग हूँ, मैं अपना ही धुंआ हूँ।

मुझे परखने वाले शायद ये नहीं जानते,
मैं अपना गुनाह हूँ, मैं अपनी ही सज़ा हूँ।

हर बार नाकाम हुई है साजिश दुनिया की,
मैं अपना मुकद्दर हूँ, मैं अपना ही खुदा हूँ।

मुझे लौट कर फिर वहीं वापस जाना है,
मैं अपनी मंज़िल हूँ, मैं अपना ही रास्ता हूँ।

खोया रहता हूँ सुरूर में शाम ओ सहर,
मैं अपना जाम हूँ, मैं अपना ही नशा हूँ।

बिखरती हैं टकरा कर लहरें मुसलसल,
मैं अपना समंदर हूँ, मैं अपना ही तूफां हूँ।

उठती उंगलियों का मुझे कोई खौफ़ नहीं,
मैं अपना अक्स हूँ, मैं अपना ही आईना हूँ।

हर सिम्त शोर है हुजूम ए दुनिया का,
मैं अपनी आवाज़ हूँ, मैं अपनी ही सदा हूँ।

मैं न कोई मसीहा न कोई रहनुमा हूँ
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