मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में

क्या लिखें क्या ना लिखें इस किताब में,
मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में|

बयां कैसे करूं इतने रंगों को,
इतने रंग दिखते हैं मुझे जनाब में|
मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में…

ख्वाब में ही सही पर एक फूल तो है,
सबकुछ बंजर नहीं दिल-ऐ-बर्बाद में|
मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में…

थोड़ा नमकीन भी है ये गमज़दा,
थोड़ा मीठा भी है मिजाज़ में|
मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में…

कुछ सच के टुकड़े और झूट के आईने,
क्या-क्या ना मिला मुझे एक जवाब में|
मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में…

डरता हूँ अपनी ही सूरत से ‘वीर’,
मुझे रहने दो यूँ ही हिजाब में|
मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में…

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