मंजिलों को खबर कर दो

पांव जमे थे अब तलक, अब कदम बढाता हूँ,
मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ|

रंज और गम का सहरा, अब गवारा नहीं मुझको,
होसलों के समंदरों में, झूम कर नहाता हूँ|
मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ..

अरसे से तुम्हारा कर्ज़, ढोता हूँ कांधों पर,
आज अपने बाज़ुओं से, हर वो संग हटाता हूँ|
मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ..

दर्द और ज़ख्म जो, हुए थे तुमसे हासिल,
हर एक फांस को, अपने पैरों से निकालता हूँ|
मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ..

सारी बंदिशें फना होंगी, सारी सलाखें धुआं होंगी,
अपने पांव की जंजीरें, अपनी आग से जलाता हूँ|
मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ…

जीनी है ये जिंदगी मुझे, सिर्फ अपनी शर्तों पर,
अब जो भी हो आगे, अंजाम से नहीं घबराता हूँ|
मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ…

आंख लगी थी मगर, मिटा नहीं था ‘वीर’,
देख मेरा नूर अब, देख मैं नज़र मिलाता हूँ|
मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ..

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