मौत का इंतज़ार

घिस घिस के हाथ लहू हुआ,
लकीरें मिट जाती क्यों नहीं|

सांसों ने बांधा है मुझे इनसे,
एक बार रूठ के जाती क्यों नहीं|

रूठी जिंदिगी को मनाया हमने बहुत,
कभी ये हमें मनाती क्यों नहीं|

है खंजर तेरा मेरे गले पर,
हलक मुझे क्यों कर डालती नहीं|

मुन्तज़िर अपनी मौत का क्यों रहे वीर,
उसकी है तो आती क्यों नहीं|

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