मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं

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मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं,
मेरी तरह वो तुम्हें पसंद आये तो नहीं |

क्या लफ़्ज़ों को है गिला-शिकवा बहुत ?
क्या कहीं वो भी मेरे सताये तो नहीं |
मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं…

सहरा तक पहुँचती हर एक मौज से पूछो,
क्या उसने कोई सफीने डुबाये तो नहीं |
मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं…

बेसबब इलज़ाम मुनासिब नहीं गैरों पर ‘वीर’,
क्या कहीं अपनों ने ही घर जलाये तो नहीं |

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