नहीं देखी जाती

nahin-dekhi-jaati

तुम्हारी आँखों में हमसे वहशत नहीं देखी जाती,
अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती|

वो मेरी वफ़ा का रोज़ इम्तिहान क्यों लेता है?
क्या उससे मेरी बेशर्त मोहब्बत नहीं देखी जाती?
अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती…

पलक-पलक हर आँख में क्यों चुभता है भला,
इस ज़माने से हमारी कुर्बत नहीं देखी जाती|
अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती…

जब उड़ो तब आस्मां की सरहदें मत देखना,
ख्वाबों से ज़मीन की हकीकत नहीं देखी जाती|
अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती…

अपनों के लिए तुम हज़ारों गम उठा लेना ‘वीर’,
फ़र्ज़ निभाने में कभी कीमत नहीं देखी जाती|

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