निभा रहा था अब तलक

निभा रहा था अब-तलक वो मेरा किरदार नहीं है,
आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है |

उस तक पहुँचते-पहुँचते खो दिया है खुद को,
अब उस तक पहुंचा हूँ जो मेरा तलबगार नहीं है |
आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है…

सबका अलग रास्ता है और सबका अपना सच,
जो रहनुमा बन बैठा है वो मेरा मददगार नहीं है |
आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है…

चुका रहा है लम्हों की कीमत बची जिंदिगी से,
तू सिर्फ पहले तू ही है कोई मेरा कर्ज़दार नहीं है |
आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है…

मैंने नये सांचे बना तो लिए हैं अपने लिए,
अपने माज़ी से मगर कोई मेरा इनकार नहीं है |
आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है…

मैं सहारा ढूँढने निकला तो फिर कोई न मिला,
मेरे सिवा कोई भी अब मेरा जवाबदार नहीं है |
आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है…

उसके नज़रिए से देखा तब समझ पाया ‘वीर’,
मैं अपना ही कातिल हूँ वो मेरा गुनहगार नहीं है |

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  • Deevasg

    Bahot umda!

  • yashodadigvijay4

    वजनदार रचनामै अपना ही कातिल हूँ
    पर वो…..गुनाहगार
    बिलकुल भी नहीं

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