पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए

Pairon mein teri bediyan hain

क्या तुमसे बयां करूँ सबब-ए-हिज्र हमनफस,
पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए |

कहने को एक जिंदिगी दोनों के पास है मगर,
इन मुस्कुराते चेहरों के पीछे हैं दिल जले हुए |
पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए…

एक आंधी चली और गुबार से उड़ गए हम,
ज़माना गुज़र गया वापस घर को चले हुए |
पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए…

जब बच्चों की आँखों में अपना बचपन देखता हूँ,
सोचता हूँ, क्या कुछ न छिन गया उनसे जो बड़े हुए |
पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए…

अजब माजरा है तेरी इस दुनिया का ए रब,
हर हाथ में खंजर है और सब हैं डरे हुए |
पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए…

एक सच ये भी है के राख हो जायेंगे हम ‘वीर’,
एक सच ये – के अरसा हो गया है हमें मरे हुए |

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  • yashodadigvijay4

    आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 06/04/2013 nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों  को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है. धन्यवाद!

  • Nihar Ranjan

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आपने. हर शेर बेजोड़ है.

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