पसंद

सच, क्या तुझे भी सच सुनना पसंद है ?
मैं झूठ हूँ, मुझे सच बुनना पसंद है |

गाँठ जीस्त की खोल रहा है गुज़रता वक्त,
मैं लम्हा हूँ, मुझे उलझना पसंद है |

उम्मीद की डोर से पिरोई है आरजू मगर,
मैं हसरत हूँ, मुझे बिखरना पसंद है |

मेरे बाद तुझे तलब न रहेगी मंजिल की,
मैं रास्ता हूँ, मुझे भटकना पसंद है |

हर दिन वही चेहरा लिए कैसे मिलूँ तुझसे,
मैं हालात हूँ. मुझे बदलना पसंद है |

तेरे हर इम्तिहान से मेरा वजूद कायम है,
मैं मोहब्बत हूँ, मुझे परखना पसंद है |

हर दाग किसी फौजी के तमगे से कम नहीं,
मैं दिल हूँ, मुझे संवारना पसंद है |

सहरा से पूछ एक बूँद की तिश्नगी ‘वीर’,
मैं दर्द हूँ, मुझे सिसकना पसंद है |

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