पहचान तो हो

कद्र-ए-वफ़ा न सही मगर, कद्र-ए-इंसान तो हो,
कम से कम तुम्हें अच्छे-बुरे की, पहचान तो हो|

ये मुमकिन है के ना चीख पाओ, तुम ज़ुल्म के आगे,
मगर ज़रूरी है के हलक में तुम्हारी, जुबान तो हो|
कम से कम तुम्हें अच्छे-बुरे की, पहचान तो हो…

बेदाग ना हो तुम्हारा खुदा ऐसा हो सकता है,
लेकिन ज़रूरी है तुम्हारी शक्सियत में, बुलंद ईमान तो हो|
कम से कम तुम्हें अच्छे-बुरे की, पहचान तो हो…

मैं आँधीयों से लढ़कर भी, पहुँच जाऊँ उस तलक,
ना सही कोई हमसफ़र मगर, मंजिल का कोई निशान तो हो|
कम से कम तुम्हें अच्छे-बुरे की, पहचान तो हो…

बाघबान है ‘वीर’, एक गुल के लिए फना भी हो जाता,
मगर उस गुल की नज़र में कोई गुलिस्ताँ तो हो|
कम से कम तुम्हें अच्छे-बुरे की, पहचान तो हो…

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