फिर रहे हैं

कीमती जिंदिगी लुटाते फिर रहे हैं,
हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं |

तुम्हारा होने की सज़ा मिली है हमें,
ज़र्रा ज़र्रा खुद को मिटाते फिर रहे हैं |
हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं…

मुझे ज़माने भर में बाट आया है वो,
हर शख्स से खुद को बचाते फिर रहे हैं |
हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं…

कौन है जिसे ख़ामोशी समझ आती है,
सब अपना किस्सा चिल्लाते फिर रहे हैं |
हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं…

यहाँ कोई नहीं जिसमें बचपना न हो,
शहर के सब बाशिंदे बिलखाते फिर रहे हैं |
हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं…

आओ इस मोहब्बत का भी हिसाब कर लें,
अब वो हमें करम गिनाते फिर रहे हैं |
हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं…

सुन वो सदायें दे रहा है तुम्हें ‘वीर’,
देख सारे रास्ते बुलाते फिर रहे हैं |

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